इलाहाबाद हाईकोर्ट : हर असफल रिश्ता रेप नहीं

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इलाहाबाद हाईकोर्ट : हर असफल रिश्ता रेप नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शादी का वादा कर बनाए गए लंबे समय के सहमति आधारित संबंध को हर परिस्थिति में दुष्कर्म (Rape) नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि शुरुआत से ही धोखा देने की मंशा साबित नहीं होती है तो बाद में विवाह नहीं होने पर मामला स्वतः रेप की श्रेणी में नहीं आता।

इंस्टाग्राम से शुरू हुई थी दोस्ती

मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला और आरोपी कपिल सोम की मुलाकात Instagram के जरिए हुई थी। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इनकार कर दिया। साथ ही आरोपी और उसके परिवार पर मारपीट तथा जातिसूचक टिप्पणी करने के आरोप भी लगाए गए थे।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने कहा कि झूठा विवाह वादा और बाद में किसी कारण से विवाह टूट जाना दोनों अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं।

अदालत के अनुसार दुष्कर्म का मामला तभी बनता है जब यह साबित हो कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया था।

बालिग और शिक्षित थी महिला

कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता 24 वर्षीय बालिग और शिक्षित महिला थी। वह अपनी इच्छा से आरोपी के संपर्क में आई और लंबे समय तक उसके साथ रही।

अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से संबंध पूरी तरह सहमति आधारित प्रतीत होते हैं और प्रारंभिक तौर पर धोखाधड़ी की आपराधिक मंशा दिखाई नहीं देती।

हर असफल रिश्ता अपराध नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि हर असफल प्रेम संबंध या टूटे हुए विवाह प्रस्ताव को आपराधिक मुकदमे में बदल दिया जाए तो न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि हर असफल प्रेम संबंध को रेप नहीं कहा जा सकता।

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BNS की धारा 69 लागू नहीं

अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 लागू नहीं हो सकती क्योंकि कथित घटनाएं वर्ष 2022-23 की हैं जबकि BNS 1 जुलाई 2024 से लागू हुआ है।

कानून के अनुसार किसी नए आपराधिक प्रावधान को पुराने मामलों पर पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता।

SC ST एक्ट पर भी टिप्पणी

कोर्ट ने पाया कि एफआईआर और बयानों में सार्वजनिक स्थान पर जातिसूचक अपमान के स्पष्ट आरोप नहीं हैं। केवल जाति का उल्लेख कर विवाह से इनकार करना स्वतः SC/ST Act की धाराओं को आकर्षित नहीं करता।

हाईकोर्ट ने रद्द की पूरी कार्यवाही

सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही अदालत ने 5 जुलाई 2025 के समन आदेश सहित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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