मप्र हाईकोर्ट : लंबी जुदाई और आर्थिक

blog-img

मप्र हाईकोर्ट : लंबी जुदाई और आर्थिक
अस्थिरता भी ‘मानसिक क्रूरता

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि पति-पत्नी के बीच संबंध इस हद तक खराब हो जाएं कि उनके जुड़ने की कोई गुंजाइश न बचे, तो ऐसे विवाह को जबरदस्ती बनाए रखना निरर्थक है। जस्टिस विवेक कुमार सिंह और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की खंडपीठ ने माना कि पति-पत्नी के बीच लंबे समय तक लगातार अलगाव हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत ‘मानसिक क्रूरता’ के दायरे में आता है।

अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए एक पत्नी की तलाक याचिका को स्वीकार कर लिया और फैमिली कोर्ट बैतूल के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें तलाक की मांग को खारिज कर दिया गया था।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक अपीलकर्ता (पत्नी) और प्रतिवादी (पति) का है, जिनका विवाह 12 जुलाई 2008 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था। पत्नी का आरोप था कि शादी के समय उसके पिता ने दहेज के रूप में 1,75,000 रुपये दिए थे। शादी से पहले पति ने दावा किया था कि वह अमरावती के वीएमबी कॉलेज में अस्थायी नौकरी करता है और जल्द ही उसकी नौकरी पक्की हो जाएगी। लेकिन शादी के बाद पत्नी को पता चला कि पति के पास आय का कोई साधन नहीं है और उसने झूठ बोला था।

सितंबर 2009 में दंपति की एक बेटी हुई। पत्नी ने कोर्ट को बताया कि उसने 13 जुलाई 2010 को ससुराल जाकर रिश्ता बचाने की कोशिश की, लेकिन पति ने साथ रहने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद से वह अपनी बेटी के साथ अलग रह रही है और ट्यूशन पढ़ाकर अपना और बच्ची का भरण-पोषण कर रही है।

पत्नी ने क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में अर्जी दी थी। हालांकि, 6 मई 2015 को फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अलग रह रही है और उसने दहेज या क्रूरता को लेकर कोई एफआईआर (FIR) भी दर्ज नहीं कराई है।

फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपीलकर्ता के वकील श्री संदीप सिंह बघेल ने तर्क दिया कि पति की कोई कमाई नहीं है और पत्नी अकेले ही अपनी बेटी की जिम्मेदारी उठा रही है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष 2013 से पूरी तरह अलग रह रहे हैं और यह शादी अब केवल नाम की रह गई है।

मृत रिश्ते को ढोने का कोई मतलब नहीं

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे समर घोष बनाम जया घोष और शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन) का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता केवल मारपीट तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबी जुदाई और वैवाहिक संबंधों का पूरी तरह खत्म हो जाना भी इसमें शामिल है। पीठ ने अपने फैसले में कहा: "रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से यह स्पष्ट है कि पक्षों के बीच संबंध इस कदर खराब हो चुके हैं कि अब वापसी की कोई उम्मीद नहीं है। इतने लंबे समय के अलगाव ने इन मतभेदों को कभी न भरने वाला बना दिया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पति-पत्नी ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण साल अदालतों में लड़ते हुए बिता दिए हैं।"

कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में शादी पूरी तरह से टूट चुकी है (Irretrievable Breakdown of Marriage) और यह भावनात्मक रूप से मर चुकी है। ऐसे में कानून द्वारा उन्हें जबरन पति-पत्नी के रूप में रहने के लिए मजबूर करना, भावनाओं के प्रति क्रूरता होगी।

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *



दिल्ली हाईकोर्ट :  पत्नी से परिवार की
अदालती फैसले

दिल्ली हाईकोर्ट :  पत्नी से परिवार की , देखभाल करने को कहना अपराध नहीं

यह मामला उस शिकायत से जुड़ा था जिसमें पत्नी ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ धारा 498A IPC, धारा 406 IPC और घरेलू हिंसा अ...

इलाहाबाद हाईकोर्ट : पत्नी के पास अलग रहने
अदालती फैसले

इलाहाबाद हाईकोर्ट : पत्नी के पास अलग रहने , के पर्याप्त कारण, तो गुजारा-भत्ता की हकदार

कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि पति और पत्नी के बीच लंबे समय से मुकदमेबाजी चल रही है, जिसमें दहेज उत्पीड़न...

मप्र हाईकोर्ट : 13 साल का रिश्ता है, इसलिए रेप असंभव
अदालती फैसले

मप्र हाईकोर्ट : 13 साल का रिश्ता है, इसलिए रेप असंभव

हाईकोर्ट ने 'आपसी सहमति' बताकर रद्द की लेफ्टिनेंट कर्नल पर हुई FIR

कलकत्ता हाईकोर्ट : पति की नौकरी खतरे में डालना भी क्रूरता
अदालती फैसले

कलकत्ता हाईकोर्ट : पति की नौकरी खतरे में डालना भी क्रूरता

सीआईएसएफ जवान मामले में कोर्ट ने पत्नी के दावे विरोधाभासी पाए

मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार की अर्जी
अदालती फैसले

मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार की अर्जी , पर सुप्रीम कोर्ट  : बराबरी का एक रास्ता UCC भी

CJI ने चिंता जताते हुए कहा कि सुधार की जल्दबाज़ी में कहीं ऐसा न हो कि हम मुस्लिम महिलाओं को मौजूदा अधिकारों से भी वंचित...

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट  : आदिवासी भी हिंदू मैरिज एक्ट के दायरे में
अदालती फैसले

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट  : आदिवासी भी हिंदू मैरिज एक्ट के दायरे में

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के एक फैसले को रद्द कर दिया और एक आदिवासी समुदाय के व्यक्ति के साथ अनुसूचित जाति की महिला के तल...