जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ममता के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि एक माँ की दूसरी शादी, उसके बच्चे को उससे अलग करने का कानूनी आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि ममता की गोद से बड़ा कोई हक नहीं हैऔर इसी के साथ कक्षा 7वीं में पढ़ रहे बालक अवध की कस्टडी दादा-दादी को सौंपने की मांग ठुकरा दी।
पुनर्विवाह बनाम परवरिश की लड़ाई
मामला सागर निवासी नाथूराम और उनकी पत्नी ताराबाई से जुड़ा है। उनके बेटे अरविंद की मृत्यु के बाद बहू विनिता ने दूसरा विवाह कर लिया था और अपने बेटे अवध को साथ लेकर नए घर चली गई थी। दादा-दादी ने भोपाल फैमिली कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट में यह तर्क दिया कि विनिता के पुनर्विवाह के बाद बच्चे का भविष्य वहां सुरक्षित नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
कोर्ट ने सुना बेटे का बयान
मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने बालक अवध की भावनाओं को सर्वोपरि रखा। फैमिली कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, अवध ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अपनी माँ के साथ बेहद खुश है। उसने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कोर्ट को बताया कि उसने बचपन से अपने दादा-दादी को देखा तक नहीं है, इसलिए उनके प्रति उसका कोई लगाव नहीं है। बालक की इस मासूम पुकार ने कोर्ट के फैसले में अहम भूमिका निभाई।
कोर्ट की नसीहत
अदालत ने याचिकाकर्ताओं (दादा-दादी) को नसीहत देते हुए कहा कि यदि उन्हें वास्तव में अपने पोते के भविष्य और उसकी पढ़ाई की चिंता है, तो वे उसकी आर्थिक मदद कर सकते हैं। बेंच ने विश्वास जताया कि बालक की शिक्षा और बेहतरी के लिए विनिता इस सहायता को स्वीकार करने से मना नहीं करेगी। कोर्ट ने अंततः मामले को हस्तक्षेप योग्य न मानते हुए दादा-दादी की अपील खारिज कर दी।
सन्दर्भ स्रोत : खबर अभी तक डॉट कॉम



Comments
Leave A reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *