मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के बोरगांव की रहने वाली माधुरी पटेल ने कुश्ती में अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी सफलता की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।
पिता ने बेटी को बनाया पहलवान
माधुरी के पिता जगदीश पटेल खुद पहलवानी करते थे, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उनका सपना अधूरा रह गया। उन्होंने अपनी बेटी को पहलवान बनाने का संकल्प लिया और गांव की मिट्टी में अखाड़ा तैयार कर ट्रेनिंग शुरू कर दी।
12 साल की उम्र से शुरू हुई मेहनत
माधुरी ने सिर्फ 12 साल की उम्र में कुश्ती शुरू की। शुरुआत में उनकी रुचि कम थी, लेकिन पिता की मेहनत और प्रेरणा ने उन्हें एक बेहतरीन खिलाड़ी बना दिया।
राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहचान
माधुरी अब तक 12 मेडल जीत चुकी हैं। उन्होंने हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया। वहीं बुल्गारिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया।
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ओलंपिक गोल्ड है अगला लक्ष्य
माधुरी का सपना भारत के लिए ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतना है। वे नौकरी मिलने के बाद पूरी तरह ओलंपिक की तैयारी पर फोकस करना चाहती हैं।
गांव के बच्चों को मुफ्त में दे रहे ट्रेनिंग
जगदीश पटेल सिर्फ अपनी बेटी तक सीमित नहीं रहे। वे गांव के 150 से ज्यादा बच्चों को मुफ्त में कुश्ती की ट्रेनिंग दे रहे हैं, जिसमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं।
माधुरी और उनके पिता की कहानी यह साबित करती है कि मेहनत, परिवार का साथ और मजबूत इरादों से हर सपना पूरा किया जा सकता है। यह कहानी आज देश की लाखों बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
“म्हारी छोरियां भी छोरों से कम नहीं”
माधुरी पटेल ने अपने संघर्ष और उपलब्धियों से यह साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं हैं।
सन्दर्भ स्रोत : न्यूज़ 18
छाया : दैनिक भास्कर



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