पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पहली पत्नी जीवित है और दूसरा विवाह कानूनन वैध नहीं है, तो ऐसी महिला को मृत सरकारी कर्मचारी की फैमिली पेंशन का अधिकार नहीं मिलेगा। अदालत ने कहा कि केवल वैध विवाह के आधार पर ही किसी को विधवा माना जा सकता है और पेंशन लाभ दिया जा सकता है।
पूरा मामला क्या है
यह मामला मेजर हरि सिंह से जुड़ा है, जिनकी मृत्यु के बाद उनकी पहली पत्नी मोहिंदर कौर और दूसरी पत्नी प्रिया के बीच सेवानिवृत्ति लाभों और फैमिली पेंशन को लेकर विवाद शुरू हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने शुरुआत में प्रिया के पक्ष में निर्णय दिया था, लेकिन बाद में अपीलीय अदालत ने विवाह संबंधी साक्ष्यों के आधार पर उन्हें कानूनी पत्नी माना। मामला आगे बढ़ते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने अपीलीय अदालत का फैसला पलट दिया और मोहिंदर कौर को ही वैध पत्नी घोषित किया।
इसके बाद प्रिया ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन वर्ष 2006 में उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बावजूद उन्होंने फैमिली पेंशन में हिस्सेदारी की मांग जारी रखी।
हाईकोर्ट का फैसला क्या कहता है
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के अनुसार दूसरी शादी तभी मान्य होगी जब वह कानूनन वैध हो। यदि पहली पत्नी के रहते विवाह किया गया है, तो वह विवाह शून्य (void) माना जाएगा।
अदालत ने कहा कि विधवा (Widow) का अर्थ केवल मृत व्यक्ति की कानूनी रूप से मान्य पत्नी होता है। इसलिए अवैध विवाह से उत्पन्न संबंधों के आधार पर फैमिली पेंशन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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चार मुख्य बिंदुओं में मामला
• सेवानिवृत्ति लाभ विवाद: मेजर हरि सिंह की मृत्यु के बाद पहली पत्नी और दूसरी कथित पत्नी के बीच पेंशन और लाभों को लेकर विवाद हुआ।
• कानूनी पत्नी का निर्धारण: विभिन्न अदालतों में सुनवाई के बाद मोहिंदर कौर को ही वैध पत्नी माना गया।
• पेंशन दावा खारिज: दूसरी महिला प्रिया द्वारा सह-विधवा के रूप में पेंशन मांगने का दावा अस्वीकार कर दिया गया।
• नियमों की व्याख्या: अदालत ने कहा कि पेंशन नियम 54(7) केवल वैध विवाह पर लागू होता है, अवैध विवाह पर नहीं।
कानून क्या कहता है
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा नियमों के तहत पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी प्रतिबंधित है। ऐसे मामलों में दूसरी शादी से कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में भरण-पोषण या अन्य सामाजिक पहलुओं पर अलग दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है, लेकिन फैमिली पेंशन पूरी तरह कानूनी अधिकार है और इसे केवल नियमों के अनुसार ही दिया जा सकता है।



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