उड़ीसा हाइकोर्ट : पंचायत अदालत नहीं, शादी का

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उड़ीसा हाइकोर्ट : पंचायत अदालत नहीं, शादी का
वादा कर यौन अपराध का समझौता नहीं हो सकता

उड़ीसा हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कहा कि पंचायत कोई अदालत नहीं है और सरपंच के पास मजिस्ट्रेट जैसी न्यायिक शक्तियां नहीं होतीं। इसलिए बाल यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों को पंचायत बैठाकर शादी के वादे के जरिए निपटाया नहीं जा सकता।

जस्टिस संजीब कुमार पाणिग्रही की पीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें एक व्यक्ति को नाबालिग लड़की के साथ बार-बार दुष्कर्म करने के मामले में दोषी ठहराया गया। अदालत ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज की।

अदालत ने अपने फैसले में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित उस चिंताजनक प्रवृत्ति पर भी गंभीर टिप्पणी की, जिसमें गांव के प्रभावशाली लोग पंचायत बैठाकर नाबालिग से यौन अपराध जैसे मामलों को समझौते के जरिए सुलझाने की कोशिश करते हैं और अक्सर आरोपी से शादी का वादा करवाकर मामला दबा दिया जाता है। अदालत ने कहा, “यह याद रखना चाहिए कि कोई भी पंचायत कानून की अदालत नहीं है। सरपंच मजिस्ट्रेट की तरह न्यायिक अधिकार नहीं रखता। अपराधों का फैसला केवल न्यायिक व्यवस्था के संस्थानों के माध्यम से ही हो सकता है।”

मामला कंधमाल जिले के फिरिंगिया क्षेत्र का है। वर्ष 2016 में आरोपी ने कथित रूप से एक नाबालिग लड़की के घर में उसके माता-पिता की अनुपस्थिति में जबरन दुष्कर्म किया और उसे किसी को न बताने की धमकी दी। लड़की ने बाद में अपनी मां को घटना की जानकारी दी। इसके बाद गांव में पंचायत की बैठक हुई, जिसमें आरोपी ने कथित रूप से लड़की के साथ संबंध बनाने की बात स्वीकार की। पंचायत में यह तय किया गया कि लड़की के बालिग होने के बाद आरोपी उससे विवाह करेगा।

साल 2021 में दोनों की शादी भी हुई लेकिन शादी के 10-15 दिन बाद ही आरोपी ने लड़की को छोड़ दिया और उससे संपर्क खत्म कर दिया। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी के परिवार ने उसकी हत्या करने की कोशिश की। इसके बाद वर्ष 2024 में मामला दर्ज कराया गया। आरोपी की ओर से यह दलील दी गई कि घटना के आठ साल बाद FIR दर्ज होना अभियोजन के मामले को कमजोर करता है। हालांकि, हाइकोर्ट ने इस तर्क को खारिज किया। अदालत ने कहा कि शुरुआती समय में मामला परिवार और गांव की बैठक में निपटाने की कोशिश की गई, जहां आरोपी ने शादी का वादा किया। इसलिए FIR में देरी को पूरे मामले के साक्ष्यों के साथ देखकर ही आंका जाना चाहिए।

आरोपी ने यह भी तर्क दिया कि उसने बाद में पीड़िता से शादी कर ली, इसलिए उसके खिलाफ आपराधिक मामला खत्म माना जाना चाहिए। इस पर अदालत ने साफ कहा कि यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा, “यदि अपराध उस समय हुआ जब पीड़िता अठारह वर्ष से कम उम्र की थी तो बाद में हुआ विवाह उस अपराध को समाप्त नहीं कर सकता और न ही आपराधिक कानून के लागू होने से रोक सकता है।” फैसले में हाइकोर्ट ने पंचायतों को सख्त संदेश देते हुए कहा कि बाल यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों को गांव की बैठकों में निपटाने की कोशिश कानून के अधिकार क्षेत्र की अवहेलना है। अदालत ने कहा कि सरपंच या गांव के बुजुर्गों की जिम्मेदारी कानून को रोकना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे मामलों की सूचना तुरंत पुलिस या संबंधित अधिकारियों को दी जाए। साथ ही अदालत ने जिला प्रशासन और पुलिस को निर्देश दिया कि गांव स्तर पर सरपंचों और स्थानीय प्रतिनिधियों को संवेदनशील बनाया जाए ताकि वे समझ सकें कि नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराध किसी निजी समझौते का विषय नहीं हैं। ऐसे मामलों की तुरंत कानून के अनुसार रिपोर्ट करना अनिवार्य है।

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