सिरेमिक कला में मप्र की महिलाओं का योगदान

blog-img

सिरेमिक कला में मप्र की महिलाओं का योगदान

छाया : लाईमा सिरेमिक्स डॉट कॉम

• सारिका ठाकुर

सिरेमिक शब्द प्राचीन ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ है जला हुआ। प्राचीन काल से चीन, कोरिया, जापान आदि देशों का सिरेमिक कला पर वर्चस्व रहा है। भारत में इसका इतिहास 14वीं सदी से शुरू होता है। दिल्ली से सटे खुर्जा में सिरेमिक उद्योग की स्थापना 14वीं सदी में तैमूर लंग के समय हुई थी। इसी समयावधि में जयपुर की ब्लू पॉटरी का भी विकास हुआ। ग्वालियर के सिंधिया घराने द्वारा दिल्ली में सबसे पहले 1914 में सिरेमिक उद्योग का आरंभ दिल्ली पॉटरी वर्क्स के नाम से किया गया। बाद में 1923 के आसपास ग्वालियर में ग्वालियर पॉटरीज़ के नाम से सिरेमिक उद्योग की स्थापना की गयी। तब तक बड़ौदा पॉटरीज, बंगाल पॉटरीज़ आदि अस्तित्व में आ चुके थे। इन उद्योगों में पहले खाने की मेज के लिए सुन्दर बर्तन बनाए जाते थे। लम्बे समय तक इस माध्यम में कला से अधिक व्यवसाय हावी रहा। किसी भी माध्यम को दोनों ही दृष्टियों से देखने की ज़रुरत होती है। उद्योग में एक ही डिज़ाइन,पैटर्न और रंग की वस्तुओं का बड़ी संख्या में निर्माण होता है। वहाँ कलाकार सिर्फ एक बार रचता है जबकि कलाकार के रूप में उसकी हर कृति अनूठी, मौलिक और एक ही होती है।

मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर में कला के रूप में सिरेमिक आर्ट  को बढ़ावा देने का श्रेय भारत भवन को जाता है। स्थापना के तीन वर्ष बाद रुपंकर कला में सिरेमिक कला की शुरुआत की गयी। शुरुआत में विशेषज्ञों को बुलाकर कुछ कार्यशालाएँ आयोजित की गईं, बाद में नियमित रूप से कलाकार आने लगे। प्रारंभिक दिनों में यहाँ आकर सीखने वालों में शम्पा शाह, निर्मला शर्मा एवं दीपाली दरोज आदि का नाम उल्लेखनीय है। उस समय स्कूलों और कॉलेजों से वर्कशाप के लिए आने वाले झुंड के लिए सिरेमिक कला से ज्यादा कौतुहल का विषय था। सीखने वालों की अच्छी खासी संख्या के बावजूद कुछ कर गुजरने वाले बहुत कम रह जाते थे। इसके पीछे मुख्य कारण था सिरेमिक माध्यम को शिल्प से इतर कला के रूप में स्थापित करने की चेष्टा, जिसने अभिव्यक्ति को एक नया माध्यम दिया। उस समय ज्यादातर लोग इसके बारे में अता-पता करने और देखने आते थे कि ये आखिर है क्या।

सिरेमिक कला की जानी मानी कलाकार शम्पा शाह भी घरवालों के कहने पर ‘देखने में क्या जाता है’ सोचकर भारत भवन पहुंची थीं, जहाँ पहले ही दिन मिट्टी से उनकी दोस्ती हो गई। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाई और आज भी वे नये-नये प्रयोगों में व्यस्त हैं। उनकी कृतियाँ नए नकोर के चमकीलेपन से थोड़ी अलग होती हैं, उनकी फिनिशिंग पुरानेपन का अहसास कराती है। एक साक्षात्कार में उनका कहना था कि – “मैं चाहती हूँ मेरा काम अपने नयेपन से किसी को चौंकाए नहीं, उन्हें देखकर ऐसा लगे कि वे बहुत पहले से हैं।“ इसलिए उनकी कुछ कुछ कृतियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो किसी खुदाई में बाहर निकली हों। शम्पा के सिरेमिक हमेशा उस नए रूपाकारों को खोजने के यत्न में सफल होते हैं जिन्हें हम इसके पहले नहीं जानते थे। यह शम्पा की ही दृष्टि और कौशल का कमाल है कि वे हमें सिरामिक की नयी पहचान से अवगत कराती हैं। वे भोपाल की महत्वपूर्ण कलाकार हैं, जिन्हें चीन के प्रसिद्ध सिरेमिक विलेज में एक महीने के लिए आमन्त्रित किया गया था।

निर्मला शर्मा कॉयलिंग और पिंचिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मिट्टी के नाना आकार के बड़े पात्र बनाती हैं जिनकी सतह पर वे  हिंदी की  प्रिय कविताओं को मिट्टी के ही रंग से लिखती हैं। इसके अतिरिक्त मिट्टी की जालीनुमा संरचना से पात्र बनाने में भी उन्होंने बहुत महारत हासिल की है। उनके लिए सिरेमिक शुरुआत में रचनात्मक संतोष से जुड़ा हुआ था परन्तु बाद में पुत्र और पति को खो देने के बाद अकेलेपन का साथी बन गया। बल्कि यह कहना चाहिए यह उनके लिए बाहरी दुनिया तक पहुँच बनाने का एक पुल है।

दीपाली बैनर्जी दरोज़ ने मूलतः चित्रकला की पढ़ाई की लेकिन बाद में अपने आपको उन्होंने भारत भवन के सेरामिक्स स्टूडियो में प्रख्यात सिरेमिक कलाकार पी आर दरोज़ के मार्गदर्शन में इस विधा में पारंगत बनाया। पिछले लगभग तीन दशक से वे इस माध्यम में सक्रिय और सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके शिल्प ब्लो टॉर्च, सर्च लाईट, वाद्य यंत्रों जैसी किन्हीं आकृतियों से प्रेरित होते हैं लेकिन मिट्टी में वे इस क़दर रूपांतरित हो जाते हैं कि एक हद तक प्राकृतिक लगने लगते हैं।

इसके बाद की कड़ी में पुष्पनीर, सोनिया रशीद, निधि चोपड़ा, शुचिका राठौड़, रितिका आनंद, आरती पालीवाल एवं कुसुम गुप्ता का नाम आता है जिन्होंने अपनी अलग शैली विकसित कर न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि इस विधा को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्व. पुष्पनीर जैन ने सिरेमिक में ग्लेज पर अनुसंधान किया था और अपनी पहचान बनाई। सिरेमिक आर्टिस्ट बनने से पहले वे रंगमंच की अग्रिम पंक्ति की अभिनेत्री थीं। मंच और चाक – दोनों ही जगह उन्होंने अपनी निष्ठा और समर्पण का परिचय दिया। यही वजह है कि दोनों ही क्षेत्रों में उनका मज़बूत दखल रहा। उनकी कृतियों में खुरदुरापन स्थायी भाव रहा है। उन्होंने सुन्दर, चिकने, झिलमिलाते से पॉट कभी नहीं बनाए। उनकी समकालीन निर्मला शर्मा उनके बारे में कहती हैं कि “पुष्पनीर चेहरे बड़े मनोयोग से बनाती थी जो बड़े खूबसूरत हुआ करते थे।” उनकी मूर्तियां कभी चमड़े तो कभी धातु सा आभास देती हैं। पुष्पनीर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि “अभी भी मैं अपने अंदर की उस छिपी हुई खूबसूरत औरत को पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाई हूँ, मैं चाहती हूँ कि वह धीरे-धीरे ही बाहर आए ताकि उसका वह निर्मल सौंदर्य अक्षुण्य बना रहे।” पर ऐसा हो न सका पारिवारिक कारणों से उन्होंने एक दिन आत्महत्या कर ली।

सोनिया रशीद ने  मिट्टी का काम श्री बेनू गांगुली के मार्गदर्शन में सीखा। वे नाना प्रकार की पॉटरी बनाती हैं। आग की लपटें जिस तरह से ऊपर की ओर उठती हैं कुछ वैसा आभास देते उनके मिट्टी के पेड़ के रूपाकार भी उनके शिल्पों का अहम  हिस्सा हैं। भारत भवन में वे पुष्पनीर से मिलीं, जिन्होंने न केवल उन्हें सराहा बल्कि आगे बढ़ने के लिए उत्प्रेरित भी किया। उन्हें उत्प्रेरित करने वाली प्रकृति, पेड़ और पहाड़ ही उनके कृतियों के आधार बन जाते हैं। वह पिछले बीस वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। मुंबई के पॉटरी बाज़ार में सम्मिलित होने के बाद उसी तर्ज में वर्ष 2011 से उन्होंने भोपाल के गौहर महल में पॉटरी बाजार का आयोजन शुरू किया जिसे आशातीत सफलता मिली| इसके अलावा साझेदारी में कूज़ागारी नाम से एक स्टूडियो की भी स्थापना की।

कूज़ागारी स्टूडियो में सोनिया रशीद की साझीदार भोपाल की शुचिका राठौर सिरेमिक अहमदाबाद में सीखा फिर हिमाचल के आंद्रेगता स्टूडियो में चार महीने का प्रशिक्षण लेने के बाद भारत भवन समेत देश भर के प्रमुख स्टूडियो में कुछ-कुछ दिन काम किया। भोपाल पॉटरी बाज़ार में अपनी कृतियाँ लेकर सम्मिलित हुईं, फिर कूज़ागारी स्टूडियो से जुड़ गईं। उनकी कृतियों में ज्यामितीय आकृतियाँ दर्शनीय होती हैं।

आरती पालीवाल के रूपाकारों में पर्यावरण की चिंता और आज की आपाधापी भरे जीवन की झलकियां देखने को मिलती हैं। उनके शिल्प किन्हीं समसामयिक विषयों पर केन्द्रित हो फिर रूपाकारों में अभिव्यक्ति पाते हैं। आरती पालीवाल पिछले कई वर्षों से शहरी त्रासदी को विषय बनाकर काम कर रही हैं।

इंदौर की रितिका आनंद सिरेमिक जगत की  ख्यात कलाकारों में से एक हैं। कला के प्रति रुझान के कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और चेन्नई के रुक्मिणी देवी कॉलेज से फ़ाइन आर्ट से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अब तक वह कई प्रतिष्ठित कला दीर्घाओं में सम्मिलित हो चुकी हैं एवं वर्तमान में रिनूप नाम से स्टूडियो का संचालन कर रही हैं। इसके अलावा इनके खाते में कई पुरस्कार भी दर्ज हैं।

इसके अलावा सिरामिक्स के क्षेत्र में निधि चोपड़ा भी अपना ध्यान अलग से आकर्षित करती हैं। निधि ने जयपुर के कला महाविद्यालय से बी.एफ़.ए. के बाद सिरेमिक का काम भारत भवन में ही सीखा। उनके रूपाकारों में फूलों, विविध वानस्पतिक आकार का अंतर्गुंफन देखने मिलता है। वे चमकीले रंग या कि ग्लेज़िंग का उपयोग अपने कामों में करती हैं।

इसी प्रकार गिरिजा वायंगणकर के शिल्प पुराने  धातु निर्मित बर्तनों को पुनः मिट्टी में बनाने का उपक्रम करते हैं। वे इन पर रंग और टेक्सचर भी उन्हीं पारंपरिक भांडों  का ही देती हैं। इसके अलावा वे विगत वर्षों में प्राचीन बावड़ियों की संरचनाओं से प्रेरणा ले कर मिट्टी में रूपाकारों को गढ़ती रही हैं।

इसके अलावा नेहा सैयद, शुचिता राय एवं कुसुम गुप्ता का नाम भी इस क्षेत्र में रेखांकित करने योग्य है।

पिछले पैंतीस वर्ष की उपलब्धियों के लिहाज़ से सिरेमिक के क्षेत्र में उभरी महिलाओं की संख्या भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। भारत भवन से जुड़े वरिष्ठ सिरेमिक कलाकार पी आर दरोज़ कहते हैं कला के विकास की दृष्टि से इसे शुरुआत कहा जाएगा। किसी भी कला को पूर्ण विकसित होने में इतना समय काफी नहीं है, इसलिए अब तक जो भी इस क्षेत्र में किया गया है उसे उत्साहजनक कहा जाना चाहिए।

सन्दर्भ स्रोत – मध्यप्रदेश महिला सन्दर्भ,

सहयोग: अखिलेश अखिल, पाण्डुरंग दरोज़ एवं देवीलाल पाटीदार 

© मीडियाटिक

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ज्योति रात्रे
खेल एवं युवा कल्याण

ज्योति रात्रे

ज्योति रात्रे देश की सबसे ज़्यादा उम्र की पर्वतारोही का ख़िताब पाने वाली उन महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जो 50 की होत...

जयमाला शिलेदार
टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच

जयमाला शिलेदार

अपने समय की अत्यंत प्रतिष्ठित हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायिका और रंगमंच कलाकार जयमाला शिलेदार जीवन भर उन संगीत नाटकों से ज...

डॉ. नीता योगेंद्र पहारिया
चित्रकला एवं छायाकारी

डॉ. नीता योगेंद्र पहारिया

चंबल क्षेत्र की कला और संस्कृति एक ऐसा विषय है जिस पर बहुत अधिक चर्चा नहीं की जाती, लेकिन ग्वालियर की डॉ. नीता योगेंद्र...

दुर्गा बाई व्याम
हस्तशिल्प एवं लोक कला

दुर्गा बाई व्याम

भोपाल आने के बाद दुर्गाबाई की प्रतिभा को जनगढ़ सिंह श्याम और आनंद सिंह श्याम जैसे गोंड कलाकारों ने पहचाना और उन्हें गोंड...

निर्मला शर्मा
सिरेमिक एवं मूर्तिकला

निर्मला शर्मा

वर्ष 2007 से उन्होंने 7 दिसंबर-0 दिसंबर तक अपने सिरेमिक आर्ट की प्रदर्शनी लगाना शुरू किया, उन चार दिनों में हुई कमाई को ...