महिला किसानों के हित में शासकीय योजनाएं

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महिला किसानों के हित में शासकीय योजनाएं

मध्यप्रदेश सरकार समय-समय पर महिला किसानों के हित में योजनाएं लेकर आती रही है, जिसके सकारात्मक परिणाम भी हुए हैं। इन योजनाओं की मदद से प्रदेश में महिला कृषकों की न केवल भागीदारी सुनिश्चित हुई है बल्कि कई छिपी हुई प्रतिभाओं को भी प्रकाश में आने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। आज से चार वर्ष पूर्व तक अर्थात वर्ष 2016 तक(ताजा आंकड़े अनुपलब्ध) प्रदेश में सटीक आंकड़े न होने के बावजूद महिला किसानों की संख्या कृषि विभाग द्वारा 45 हज़ार बतायी जाती थी। पिछले चार वर्षों में निश्चय ही उनकी संख्या में बढ़ोतरी ही हुई होगी। इस लिहाज से प्रदेश की महिला किसान केवल कागजातों पर ही नहीं बल्कि अपने खेतों में भी खुद काम करने का माद्दा रखती हैं। इस हौसले के पीछे शासकीय प्रयासों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।

महिला कृषकों के हित में मप्र शासन द्वारा संचालित कुछ प्रमुख योजनाएं इस प्रकार हैं

मापवा (मध्यप्रदेश कृषि में महिलाओं की भागीदारी योजना)

मध्यप्रदेश कृषि में महिलाओं की भागीदारी(Madhyapradesh women in agriculture) परियोजना पहले चरण में(1994) डेनमार्क सरकार की सहायता से प्रदेश के सात जिलों में प्रारंभ हुआ था । वे सात जिले थे जबलपुर, नरसिंहपुर, छिन्दवाड़ा, मंडला, रायसेन, शहडोल एवं बिलासपुर(अब छत्तीसगढ़)। परियोजना के दूसरे चरण में उमरिया, कटनी, सिवनी, डिंडोरी, अनूपपुर, सतना एवं बालाघाट को जोड़ा गया। इस परियोजना के तहत इन जिलों में रहने वाली कृषक महिलाओं को कम लागत में में कृषि का तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाता था। यह परियोजना वर्ष 2005 में समाप्त हो गई। इसकी सफलता को देखते हुए प्रदेश के कृषि विभाग द्वारा पूरे प्रदेश में 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत वर्ष 2007-08 में कृषि में महिलाओं की भागीदारी(मापवा) योजना लागू की गई। इस योजना के लिए रूपये 100 लाख का आवंटन प्राप्त हुआ था।

इस योजना का उद्देश्य महिला कृषकों की जीवन शैली में सुधार कर उनमें स्थायित्व लाना है। इसके लिए विभाग के सामान्य विस्तार तंत्र को प्रशिक्षित कर, महिला किसानों को नई तकनीकी चुनने, समझने एवं एवं अपनाने योग्य बनाना है। इसके साथ ही सामान्य कृषि विस्तार तंत्र को मानव संसाधन विकास प्रशिक्षण के माध्यम से जेंडर के प्रति संवेदनशील बनाकर, उनमें वैज्ञानिकता एवं कृषकों के बीच परस्पर सम्बन्ध विकसित करने एवं नेतृत्व करने की योग्यता का विकास करना है। इस योजना के अंतर्गत महिला किसानों के हित में बेंच मार्क सर्वे, तकनीकी प्रशिक्षण, स्व सहायता समूह गठन प्रशिक्षण एवं अंतर्जिला अध्ययन भ्रमण कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।

प्रशिक्षण के लिए महिला किसानों के चयन के लिए भी एक ख़ास प्रक्रिया अपनाई जाती है। ग्रामीण कृषि अधिकारी क्षेत्र के 2 से 4 गावों में से योग्य भूमि, सिंचाई के साधन एवं पशुधन आदि को आधार मानकर 50 कृषक महिलाओं का सर्वे करते हैं जिनमें से 25 महिलाओं का चयन किया जाता है। योजना में हिस्सा लेने के लिए स्थानीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी से संपर्क किया जा सकता है ।

महिला किसान सशक्तिकरण योजना(MKSP)

 महिला किसान सशक्तिकरण योजना  केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से संचालित योजना है। इस योजना के लिए 75 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार एवं 25 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करती है। मध्यप्रदेश में इस योजना का क्रियान्वयन वर्ष 2012 को किया गया था। देश के विभिन्न राज्यों में महिला किसानों के बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए इस योजना को 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया था। योजना का उद्देश्य कृषक महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए अवसर उपलब्ध करवाना है। यह योजना दीनदयाल अंत्योदय योजना-एनआरएलएम (DAY-NRLM) का ही एक उप-घटक है। इसके तहत महिला कृषकों को खेती की विधि ही नहीं बल्कि फसल कटाई के बाद से उन्हें बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया को समझने में भी मदद की जाती है। दिसंबर 2019 में प्रकाशित टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना से देश में सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश की महिलाएं लाभान्वित हुईं। इनका आंकडा है 6.46 लाख, इस मामले में दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र एवं तीसरे स्थान पर ओड़िसा की किसान महिलाएं रहीं।

केंद्र सरकार के अन्य प्रयासों में कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग के पहल भी सराहनीय हैं। इसके तहत विभाग के प्रमुख योजनाओं में महिला किसानों के लिए 30 प्रतिशत की निधि का निर्धारण किया गया है।

इसके अलावा मध्यप्रदेश शासन द्वारा संचालित मप्र किसान अनुदान योजना के तहत कृषि उपकरणों के लिए सब्सिडी प्रदान की जाती है जिसमें महिला किसानों के लिए भारी रियायत है। उन्हें विशिष्ट लाभ दिया जाता है।

यह ऐसा मुद्दा है जिसमें समुचित विवेचना के लिए भी अभी लम्बा समय चाहिए किसी भी शासकीय योजना को तब तक पूरी तरह सफल नहीं माना जा सकता जब तक वह सामाजिक सोच को बदलने में कामयाब न हो जाए और इस प्रक्रिया की अवधि दो से तीन पीढ़ियाँ मानी जा सकती हैं सामाजिक परिवर्तन के पदचाप मात्र से हर्षित होना चाहें तो हम खुद को यह तसल्ली जरुर दे सकते हैं कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं।

मीडियायाटिक डेस्क

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