भित्ति चित्रों में

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भित्ति चित्रों में

• वेदप्रकाश नगायच

प्राचीन बाघ गुफाओं के भित्ति चित्रों के पश्चात दीर्घ अन्तराल तक चित्रांकन के अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं।

बाघ की गुफाओं के भित्तिचित्र- इंदौर से उत्तर पश्चिम में लगभग 150 कि.मी. की दूरी पर बाघिनी नदी के दायें तट पर, बाघ ग्राम से 8 कि.मी. की दूरी पर, बाघ की गुफाएं हैं. इन गुफाओं में अजंता शैली के बौद्ध धर्म के चित्रों का अंकन है।

(1) नृत्य एवं संगीत दृश्य- गुफा क्रमांक 4 जो रंगमहल के नाम से विख्यात है, इसमें सुंदर अल्प वस्त्र धारण किए नर्तकियों का घेरा बनाकर नृत्य करते हुए अंकित किया गया है। इन युवतियों के केशविन्यास तथा रंग बिरंगे वस्त्र लम्बी बाहों की फूल कढ़ी कमीजों के साथ स्पष्टता से उकेरा गया है। ये युवतियां विभिन्न वाद्य यंत्रों के साथ नृत्य कर रही हैं। उनमें एक मृदंग बजा रही है, तीन युवतियां हाथ में छोटे-छोटे डंडे लड़ाकर नाच रही हैं तथा शेष तीन कांसे का थाल बजा रही हैं। इस दृश्य का समग्र प्रभाव अत्यंत आकर्षक है। नव युवतियों के वस्त्र, केशविन्यास, वाद्ययंत्र तत्कालीन वैभव के प्रतीक हैं।

(2) गुफा क्रं. 4 में ही एक समूह चित्रण में मात्र एक महिला को हाथ में वीणा लिए अंकन शेष बचा है। वीणा को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस समूह के सदस्यों के हाथ में विभिन्न वाद्य यंत्र रहे होंगे। इसी गुफा में मुंह ढक कर रोती हुई महिला का चित्रण है, जिसे उसकी सखी सांत्वना दे रही है। शेष अंकन नष्ट हो गया है।

(3) कपिलवस्तु की राजसी शोभायात्रा के चित्रण में रानियां, दासियां एवं संगीतज्ञों को दर्शाया गया है। हाथियों पर सवार राजसी सवारी का चित्रण अत्यंत आकर्षक है।

बाघ की गुफाओं की ये कलाकृतियां वर्षो पूर्व नष्ट हो चुकी हैं। बीसवीं शती के दूसरे-तीसरे दशक में मध्यभारत राज्य द्वारा श्री एच. कचडोरियन एवं श्री नन्दलाल बोस द्वारा केनवास पर इनकी प्रतिकृतियां तैयार कराई गई थीं। वर्तमान में राज्य संग्रहालय भोपाल में प्रदर्शित हैं।  ये सभी चित्रण 5वीं शती के ई. के हैं।

मध्यप्रदेश में मध्यकाल में तीन प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं जो बुन्देली, मालवी, और ग्वालियरी नाम से जानी जाती हैं।

बुन्देली भित्तिचित्र: ओरछा के भित्तिचित्रों में मुगलों से संघर्ष भरे दिनों से लेकर 1857 तक सभी प्रकार के चित्रों को प्रतीकात्मक रूप से उकेरा गया है। लक्ष्मी मंदिर ओरछा के एक चित्र में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को अपने किले में एवं ब्रिटिश सेना को प्रयाणरत दर्शाया गया है। इस चित्र में ब्रिटिश मराठा युद्ध को चित्रित किया गया है। किला एवं किला परकोटे के अंदर बुन्देली एवं मराठी सैनिकों को पैदल एवं घोड़े पर सवार ढाल, तलवार, भाला, बंदूक तथा तोप को चलाते हुए दर्शाया गया है। किला परकोटे के बाहर ब्रिटिश सेना पैदल एवं घोड़े पर सवार है, जो तोपगाड़ी पर रखी तोपों व बन्दूकों को चलाते अंकित की गई है।

राजमहल ओरछा की एक भित्ति पर नायिका को ”रागिनी सौरथी’ के रूप में अंकित किया गया है,  जो हाथ में मयूर लिए खड़ी है एवं विचार मुद्रा में दर्शाई गई है। नायिका घाघरा-चोली पहने है, जिसमें तीन रंगी घाघरा का सुंदर अंकन किया गया है।

भित्तिचित्रों में रायप्रवीण –ओरछा में जहांगीर महल के उत्तर में रायप्रवीण महल है। इस दो मंजिला महल का निर्माण मधुकर शाह के पुत्र इन्द्रजीत सिंह ने अपनी प्रियतमा रायप्रवीण के लिए कराया था। रायप्रवीण एक कुशल नर्तकी के साथ कवियित्री, संगीतकार एवं कुशल घुड़सवार थी।

प्रथम तल के मध्य में अंकित भित्तिचित्रों में नृत्यरत रायप्रवीण, वृक्ष के सहारे खड़ी रायप्रवीण तथा घोड़े पर सवार राजा इन्द्रजीत सिंह एवं सेविकाओं के चित्र बने हुए हैं जो बुन्देली शैली के हैं।

राग रागिनी चित्रकला– मोती महल ग्वालियर के कक्ष क्र. 654 में 42 रागमाला चित्र अंकित हैं जो इस क्षेत्र में रागमाला अंकन की अंतिम कड़ी होने से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन चित्रों की आकृतियाँ, वेशभूषा, प्रकृति आदि के अंकन में अन्य शैलियों से भिन्नता है। इन रागमाला चित्रों में वाद्यों को आधुनिक रूप में अंकित किया गया है, जैसे रागिनी तोड़ी में सितार लिए नायिका, रागिनी आसावरी में बीन बजाती नायिका को चित्रित किया गया है। ‘रागिनी बसंत’ में राजसी युगल ऊंचे पर आसन पर बैठे संगीत का रसास्वादन कर रहे हैं। समक्ष में एक गायिका, दो वादिका क्रमश:ढोलक, वीणा बजाते अंकित हैं। पृष्ठ भाग में परिचारिका खड़ी है।

 रागिनी गूजरी– प्राचीन ग्रंथ अनुसार गूजरी एक 16 वर्षीय युवती है, जो गीत की संरचना या गाने का अभ्यास अपने प्रेमी के आने के इंतजार में कर रही है। यहां इस चित्र में गायों एवं भैंसों को हकाती हुए युवती का भी अंकन है। पृष्ठ भाग में हरियाली एवं वृक्षों का अंकन है।

 रागिनी बंगारण-यहां ऊंचे आसन पर ब्राह्मण बैठा है एवं उसके समक्ष दो स्त्रियां पूजन कार्य कर रही हैं। ब्राह्मण के समक्ष एक लघु देवी प्रतिमा तथा पृष्ठ भाग में चीता को दर्शाया गया है। राजमहल उद्यान के दृश्य को भी अंकित किया गया है।

ये भित्ति चित्र रागमाला की अंतिम कड़ी के रूप में 19वीं शती ई की महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं।

 

लेखक जाने माने पुरातत्वविद हैं।

© मीडियाटिक

 

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