कविता - केवल हम

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कविता - केवल हम

इन्दिरा किसलय

आँखों से लिपटी

बारिश की कोई बूँद

बादल का एक

अदद टुकड़ा

एक सगी सूर्यकिरण

एक सखी शाम

पक्षी पीपल पलाश जंगल

एक अधूरा आसमान !

        जरा से शब्द

         बड़ा सा मौन

         निरन्तर गतिमान !

हर पल आकार बढ़ाता शून्य

दूर छिटकने को बेताब

अपनी छांह !

बस इतना ही साथ रह जाता है

वक्त के साथ !

भावुकता का कद

होता जाता है कम

         यादों के ऊँचे /और ऊँचे

         हिमालय ताकते हुये

          अपने पास

          रह जाते हैं

          केवल हम !!

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